महाराष्ट्र के दौंड नगर परिषद के एक पार्षद के खिलाफ बलात्कार के गंभीर आरोपों को लेकर दर्ज एफआईआर को बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि आरोपों में तथ्यात्मक विरोधाभास हैं और घटनाक्रम में निरंतरता की कमी है। पीड़िता द्वारा पुलिस में दर्ज शिकायत में जो आरोप लगाए गए थे, उन्हें कोर्ट ने तथ्यों और बयानबाज़ी के आधार पर “अस्पष्ट” और “अविश्वसनीय” बताया। कोर्ट ने यह भी माना कि एफआईआर में आरोपों की स्पष्ट टाइमलाइन नहीं है और कई बिंदुओं पर पीड़िता के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। न्यायमूर्ति की पीठ ने यह टिप्पणी की कि जब किसी व्यक्ति पर इतना गंभीर आरोप लगाया जाता है, तो उस आरोप का स्पष्ट, सुसंगत और विश्वसनीय होना आवश्यक होता है। अन्यथा, इससे न केवल आरोपी की छवि धूमिल होती है बल्कि कानूनी प्रक्रिया का भी दुरुपयोग होता है। इस फैसले के बाद दौंड पार्षद को बड़ी राहत मिली है और यह मामला झूठे या अपुष्ट आरोपों के विरुद्ध न्यायिक सतर्कता का उदाहरण बनकर सामने आया है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल मामले की प्राथमिकी (FIR) के आधार पर लिया गया है और इसका अर्थ यह नहीं है कि पीड़िता की बातों को पूरी तरह खारिज किया गया है — बल्कि कानूनी दृष्टि से पर्याप्त आधार न होने पर एफआईआर को रद्द किया गया है।

