सोचिए अगर आपकी मौत के बाद भी आपका सोशल मीडिया अकाउंट एक्टिव रहे। पोस्ट आती रहें, मैसेज के जवाब मिलते रहें और लोग यह समझते रहें कि आप अब भी ऑनलाइन हैं। सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन अब यह आइडिया हकीकत के बेहद करीब पहुंच चुका है।
दरअसल, Meta — जो कि Facebook और Instagram की पेरेंट कंपनी है — ने एक खास तकनीक का पेटेंट कराया है जिसे Grief Tech कहा जा रहा है। इस टेक्नोलॉजी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी Large Language Model (LLM) किसी व्यक्ति के सोशल मीडिया बिहेवियर को स्टडी करता है। इसमें व्यक्ति की पोस्ट, कमेंट, लाइक, मैसेज करने का तरीका और भाषा शैली तक शामिल होती है।
AI इन सभी डेटा के आधार पर उस व्यक्ति जैसा ही लिख सकता है, उसी अंदाज़ में पोस्ट कर सकता है और यहां तक कि लोगों को रिप्लाई भी दे सकता है — जैसे कि वो इंसान अभी भी ज़िंदा हो।
क्या सच में लॉन्च होगी यह तकनीक?
Meta ने फिलहाल साफ कर दिया है कि यह फीचर अभी आम लोगों के लिए लॉन्च नहीं किया जाएगा। कंपनी का कहना है कि इस टेक्नोलॉजी से जुड़े कई गंभीर सवाल हैं — खासकर प्राइवेसी, फर्जी पहचान और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर।
एक बड़ा खतरा यह है कि लोग किसी की मौत को स्वीकार ही न कर पाएं। अगर डिजिटल रूप में वही व्यक्ति बातें करता रहे, तो शोक (grief) की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इससे इंसान भावनात्मक रूप से कंफ्यूज हो सकता है और वास्तविक नुकसान को समझने में मुश्किल हो सकती है।
Death Bots और Ghost Bots का बढ़ता ट्रेंड
हालांकि Meta फिलहाल सतर्क है, लेकिन दुनिया भर में कई स्टार्टअप और टेक कंपनियां “Death Bots” और “Ghost Bots” जैसी तकनीकों पर काम कर रही हैं। इनका मकसद यही है कि किसी व्यक्ति की डिजिटल पहचान को उसकी मौत के बाद भी ज़िंदा रखा जाए।
कुछ लोग इसे “डिजिटल अमरता” (Digital Immortality) कह रहे हैं — यानी इंसान भले ही मर जाए, लेकिन उसकी ऑनलाइन मौजूदगी हमेशा बनी रहे।
भविष्य कितना खतरनाक या उपयोगी?
यह तकनीक कुछ लोगों के लिए राहत भी बन सकती है — जैसे किसी प्रिय व्यक्ति की यादों को सहेजना या उससे आखिरी बार बातचीत जैसा अनुभव लेना। लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी है कि क्या हम सच और भ्रम के बीच की रेखा खो देंगे?
क्या किसी इंसान की डिजिटल कॉपी से बात करना सही है?
क्या यह भावनात्मक सहारा है या मानसिक धोखा?
निष्कर्ष
Grief Tech और Death Bots जैसी तकनीकें भविष्य की दिशा तो दिखा रही हैं, लेकिन साथ ही इंसान की भावनात्मक सीमाओं को भी चुनौती दे रही हैं। टेक्नोलॉजी हमें आगे बढ़ा रही है, लेकिन यह तय करना अब हमारे हाथ में है कि हम उसे इंसानियत के लिए इस्तेमाल करेंगे या भ्रम की दुनिया बनाने के लिए।
हो सकता है आने वाले समय में इंसान की डिजिटल ज़िंदगी उसकी असली ज़िंदगी से भी लंबी हो जाए — लेकिन सवाल यही है:
क्या हम सच में ऐसा भविष्य चाहते हैं?

