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थार की रेत में जीवित इतिहास: जूना बाड़मेर किले की गौरवगाथा

बाड़मेर की थार धरती पर खड़ा जूना बाहड़मेर का किला सिर्फ़ एक खंडहर नहीं, बल्कि इतिहास की जीवित आवाज़ है।

एक आकस्मिक मुलाक़ात

हाल ही में मैं अपने सरहदी शहर बाड़मेर, जिसे “थार नगरी” भी कहते हैं, वहाँ से छः कोस दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा से होकर गुजर रहा था। मखमली रेतीले धोरे और अरावली पर्वत श्रृंखला का अद्भुत दृश्य साथ-साथ चल रहा था। राजस्थान का कल्पवृक्ष खेजड़ी, सांगरी से लटालूम था।

तभी पहाड़ी पर स्थित, खंडहर हो चुका किन्तु आज भी सीना ताने खड़ा एक किला दिखा।

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उसे देखकर मेरे कदम अनायास ही रुक गए, मानो उस किले ने आवाज़ देकर मुझे रोक लिया हो।

मैंने पूछा— “कौन हो भाई?”
उत्तर मिला— “मैं जूना बाड़मेर का किला हूँ।”


जूना बाड़मेर का उद्गम

जूना—अर्थात पुराना। अपने ही शहर का पुराना रूप देखकर और अधिक जानने की जिज्ञासा जाग उठी। मैंने कई प्रश्न किए। जूना गढ़ ने अपने इतिहास और पुरानी नींवों के सहारे, बड़े धैर्य से बोलना शुरू किया।

किला सगर्व बोला कि उसकी जर्जर स्थिति देखकर दया नहीं, बल्कि उसके गौरवमयी अतीत को समझना चाहिए। लगभग 800 वर्ष पूर्व, 12वीं शताब्दी में राव बाहड़देव परमार ने इसकी स्थापना की थी।


सिल्क रूट और किराडू की समृद्धि

ऐतिहासिक सिल्क रूट का कारवां यहीं से होकर गुजरता था। इसी कारण जूना बाड़मेर और उसका पड़ोसी नगर किराडू अत्यंत समृद्ध हुआ करते थे। 108 मंदिरों वाले इस नगर का वैभव आज भी कल्पना से परे लगता है। वर्तमान में मारू-गुर्जर शैली में बने पाँच मंदिर ही शेष हैं।

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रेशम, ऊन, नमक और कीमती पत्थर उत्तर और पश्चिम से राजस्थान आते थे, जबकि मसाले, कपड़ा, चांदी और सोने के आभूषण भारत से अरब और मध्य एशिया की ओर जाते थे। थार का यह हिस्सा एशिया के स्थलीय व्यापार मार्ग को गुजरात के समुद्री मार्गों से जोड़ता था।


सत्ता परिवर्तन और संघर्ष

किले की स्थापना करने वाले परमार वंश के क्षत्रिय थे। उस समय एक कहावत प्रचलित थी—

“पृथ्वी परमारां तणी अनै, पृथ्वी तणां परमार
एक आबू गढ़ बेसाणो, दूजी उज्जैनी धार”

परंतु धरती ने कभी स्थायी धणी नहीं रखा। शासक, शासन और वंश बदलते रहे। कालांतर में परमारों का शासन समाप्त हुआ और चौहान साम्राज्य की स्थापना यहाँ हुई। हर बदलाव की कीमत होती है—यहाँ भी ऐसा ही हुआ।

किले ने सेनाओं के युद्ध, घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की चिंघाड़, तलवारों की टंकार और बलिदानों को बहुत निकट से देखा। जालौर के प्रतापी शासक कान्हड़देव के शासन का शिलालेख आज भी इस इतिहास की पुष्टि करता है।


राठौड़ों का आगमन

समय का पहिया फिर घूमा। रावत लूंका, अपने भाई रावल मंडलिक के साथ, चौहान शासक राव मुंधा को पराजित कर यहाँ शासन स्थापित करते हैं। अब जूना बाहड़मेर पर राठौड़ों का अधिकार था।

थार में तब एक कहावत प्रचलित थी—
“राठौड़ों माथे सूरज तपे”

रावत लूंका द्वारा खुदवाया गया लूंकासर तालाब और उसके समीप नागर शैली का मंदिर आज भी किले के वैभव का प्रमाण हैं। पहाड़ी पर चढ़ने पर कई किलोमीटर में फैला परकोटा और बुर्जें इसकी सामरिक शक्ति दर्शाती हैं।


जूना से नया बाड़मेर

समय के साथ व्यापार घटा और नगर का वैभव कम हुआ। सन् 1552 में रावत भीमाजी ने वर्तमान बाड़मेर शहर की स्थापना की और राजधानी जूना बाहड़मेर से स्थानांतरित हो गई।

आज बाड़मेर जिला मुख्यालय है। जहाँ कभी पानी के कुएँ दुर्लभ थे, वहाँ आज तेल के कुएँ हैं। अपने नए रूप को देखकर किला संतोष व्यक्त करता है, पर स्वयं वहीं खड़ा रहकर आने-जाने वाले लश्करों का साक्षी बना रहता है।


अंत में

अचानक मैंने स्वयं को जूना किले के सामने दंडवत पड़ा पाया। शरीर में सिहरन थी, रोंगटे खड़े थे और आँखें नम थीं।

इतिहास खंडहर नहीं होता—
वह सिर्फ़ मौन हो जाता है।

लेखक: महेंद्र सिंह तारातरा (समाजसेवी एवं चिंतक )