राजस्थान में घूंघट प्रथा का चलन काफी अरसों से चला आ रहा है.लेकिन महिलाओं ने अपने संस्कारों और सामाजिक लिहाज को ध्यान में ऱखते हुए भी कही ना कही राजनीति में अपनी भागीदारी बहुत अच्छे से निभाई.चाहे पंच हो या सरपंच,प्रधान हो या पंचायत समिति सदस्य राजनीति में कई महिलाओं की भागीदारी एक डमी की तरह भी देखने को मिलती है.पुरुष प्रधान समाज में कही ना कही पुरुष ही महिलाओं के पद की जिम्मेदारी का निर्वहन करते है.लेकिन एक तस्वीर ऐसी भी देखने को मिली जहां महिलाओं ने ये भी दिखाया कि घूंघट की आड़ में भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन बहुत अच्छे से करती है..पंचायत राज व्यवस्था में 50 प्रतिशत आरक्षण के बल पर महिलाओं के सिर पर प्रधान, पंचायत समिति सदस्य व सरपंच का ताज तो सज गया, लेकिन राजनीति में उनकी भागीदारी शोपीस से अधिक कुछ नहीं है। पंचायत समिति सदस्यों के कार्यकाल के पांच साल पूरे होने को हैं, लेकिन निर्वाचित महिलाएं घूंघट की ओट से बाहर नहीं निकल पा पाई हैं। इसे चाहे गांवों की मर्यादा कहें या रूढि़वादी परंपरा। महिला जनप्रतिनिधि बैठकों में भी घूंघट की आड़ में रहती हैं, जबकि नागौर पंचायत समिति की प्रधान एवं उप प्रधान महिलाएं हैं। इसके बावजूद सोमवार को आयोजित बैठक में प्रधान, उप प्रधान सहित अन्य महिला सदस्य घूंघट की ओट में दिखीं। इन पांच सालों में ज्यादातर महिला जनप्रतिनिधि राजनीतिक कार्यों की जगह रसोई व खेत में ही काम करती नजर आई। कुछेक को छोडक़र अधिकांश महिलाएं कभी भी घूंघट से बाहर नहीं आ सकी। कहने को तो महिलाएं चुनकर असली जनप्रतिनिधि होती हैं, लेकिन पंचायत में उनकी भागीदारी धरातल पर देखने को नहीं मिलती। कहीं उनके पति तो कहीं बेटे या परिवार का पुरुष सदस्य काम करता है। ज्यादातर कार्यक्रमों में महिलाओं की जगह उनके प्रतिनिधि ही भाग लेते हैं। हालांकि कुछ महिला जनप्रतिनिधि ऐसी भी हैं, जो अपने दम पर सत्ता को चलाती हैं और पुरुषों से बेहतर काम करके दिखाती हैं।

