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10 मिनट की डिलीवरी: सुविधा या जोखिम?

10 मिनट में डिलीवरी आज शहरी जीवन का हिस्सा बन चुकी है। इसे सुविधा के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसके साथ कई जोखिम भी जुड़े हुए हैं। Blinkit, Zepto और Swiggy Instamart जैसे प्लेटफॉर्म्स ने तेज़ डिलीवरी को अपनी पहचान बना लिया है। ऑर्डर कन्फर्म होते ही ऐप पर टाइमर शुरू हो जाता है, जबकि सड़कों की स्थिति वैसी ही बनी रहती है।

इस तेज़ डिलीवरी सिस्टम का सबसे ज़्यादा दबाव डिलीवरी बॉयज़ पर पड़ता है। उन्हें तय समय में ऑर्डर पहुंचाने की मजबूरी होती है। अगर डिलीवरी देर से होती है, तो रेटिंग गिरती है और कई बार पेनल्टी भी लगती है। इसका सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ता है, जिससे दबाव और बढ़ जाता है।

समय की इसी कमी में कई डिलीवरी बॉय तेज़ रफ्तार से वाहन चलाने लगते हैं। कुछ मामलों में गलत दिशा में गाड़ी चलाना या ट्रैफिक नियमों की अनदेखी भी देखी जाती है। इसका नतीजा सड़क हादसों के रूप में सामने आता है। देश के कई शहरों से डिलीवरी बॉयज़ के एक्सीडेंट की खबरें लगातार सामने आ रही हैं, जिनमें गंभीर चोट और जान जाने तक के मामले शामिल हैं।

अक्सर ऐसे हादसों के बाद पूरी जिम्मेदारी ड्राइवर पर डाल दी जाती है। लेकिन यह सवाल भी उठता है कि क्या हर ऑर्डर के साथ चलने वाला टाइमर इस दबाव के लिए जिम्मेदार नहीं है। यह सिस्टम सुरक्षा से ज़्यादा रफ्तार को प्राथमिकता देता है, जिससे जोखिम बढ़ जाता है।

कंपनियां सेफ्टी ट्रेनिंग और इंश्योरेंस जैसी सुविधाओं का दावा जरूर करती हैं। हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि प्रदर्शन का सबसे बड़ा पैमाना समय ही बना हुआ है। जब रेटिंग और कमाई समय से जुड़ी हो, तो सुरक्षा अपने आप पीछे छूट जाती है।

10 मिनट की डिलीवरी का यह मॉडल तकनीकी रूप से आकर्षक लग सकता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसकी कीमत इंसान चुका रहा है। डिलीवरी बॉय सिर्फ सामान नहीं पहुंचा रहा, बल्कि वह हर दिन ट्रैफिक, समय के दबाव और जोखिम से जूझ रहा है।

अब यह सोचना ज़रूरी है कि क्या इतनी तेज़ डिलीवरी वाकई ज़रूरी है। क्या 15 या 20 मिनट की डिलीवरी हमारी ज़िंदगी मुश्किल बना देगी, या फिर थोड़ी सी देरी किसी की जान बचा सकती है। तकनीक का मकसद जीवन को आसान बनाना है, लेकिन अगर वही तकनीक खतरा बन जाए, तो उस पर सवाल उठना ज़रूरी है।