जयपुर: राजस्थान में पंचायतों और नगरीय निकायों के चुनाव एक वर्ष से अधिक समय तक नहीं कराए जाने को लेकर अब संवैधानिक संकट गहराने की स्थिति बनती नजर आ रही है। इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री Ashok Gehlot ने भी चिंता जताई है।
चुनाव नहीं होने के कारण इन संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह सरकारी प्रशासकों की नियुक्ति की गई है, जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठाने वाला कदम माना जा रहा है।
संविधान के अनुच्छेद 243E और 243U के अनुसार पंचायतों और नगरीय निकायों का कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित है तथा समय पर चुनाव कराना अनिवार्य है। वहीं अनुच्छेद 243K राज्य निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र संस्था के रूप में चुनाव कराने की जिम्मेदारी देता है। इसके बावजूद राज्य सरकार द्वारा परिसीमन, पुनर्गठन और “वन स्टेट, वन इलेक्शन” जैसे कारणों का हवाला देकर चुनाव प्रक्रिया को टालने के आरोप लग रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट
इस मामले में Vikas Kishanrao Gawali v. State of Maharashtra (2021) के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा था कि इस प्रकार के प्रशासनिक या तकनीकी कारण चुनाव टालने का वैध आधार नहीं हो सकते।
हाईकोर्ट के सख्त निर्देश
Rajasthan High Court ने फरवरी, मार्च और नवंबर 2025 में इस मामले पर सुनवाई करते हुए कई बार निर्देश जारी किए। 439 याचिकाओं पर सुनवाई के बाद न्यायालय ने 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने की अंतिम समयसीमा तय की, जिसे Supreme Court of India ने भी बरकरार रखा है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव में लगातार देरी संविधान के प्रावधानों और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। इससे आम जनता के मताधिकार पर असर पड़ रहा है और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही भी कमजोर हो रही है।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि तय समयसीमा के भीतर चुनाव कराए जाते हैं या नहीं, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है।
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