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गोपेश्वर का रहस्य: जहां शिव ने खोली तीसरी आंख और जल गए कामदेव

सावन का महीना और चारो और गूंजते हर हर महादेव के जयकारे, शिवमयी भक्ति और देवो के देव देव महादेव का आशीर्वाद, ऊँचे पहाड़ और चह चहाते पक्षी ये नज़ारा है उत्तराखण्ड की गोद में बसा एक छोटा-सा शहर गोपेश्वर. देखने में साधारण सा, पर इसकी मिट्टी में दबी है एक रहस्यमयी कहानी। इसी गाँव में मौजूद है गोपीनाथ मंदिर— एक ऐसा स्थान जो सिर्फ मंदिर नहीं, साक्षात इतिहास और आस्था की भूमि है। कहते हैं, यहीं पर शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली थी और जलकर भस्म हो गए थे कामदेव। आज भी इस मंदिर में मौजूद है वो 5 मीटर ऊंचा त्रिशूल — जिसे कोई मनुष्य हिला नहीं सकता, लेकिन कहा जाता है की यदि इसे सच्ची श्रद्धा से छुआ जाये तो छूने वाले की हातो मैं हलचल सी महसूस होती है। ये कहानी है आत्मा से जुड़ी एक ऊर्जा की – आइये सुनते है शिव की इस गाथा को , गोपेश्वर एक ऐसा शहर हैं जिसमें गोपीनाथ मंदिर की गूंज बसी है। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित ये कस्बा हिमालय की गोद में बसा एक शांत स्थान है। समुद्र तल से करीब 1,300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गोपीनाथ मंदिर, भगवान शिव को समर्पित है। लेकिन इसे सिर्फ एक धार्मिक स्थल कहना इसकी गरिमा को कम आंकना होगा, क्योंकि यह मंदिर खुद में समेटे हुए है वो रहस्य जिसे सुनते ही रोमांच और भक्ति एक साथ जाग जाते हैं। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में वर्णित, कामदेव की प्रसिद्ध कथा गोपीनाथ मंदिर से जुड़ी है, कहते हैं, जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था , तो भगवान शिव ने संसार से दूरी बनाकर गहन तपस्या शुरू कर दी। शिव का ये विरक्त रूप देवताओं के लिए चिंता का कारण बन गया था , क्योंकि बिना शिव के संसार का संतुलन असंभव था। इसके लिए देवताओं ने एक उपाय सोचा और कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा गया। कामदेव ने फूलों से बने अपने बाण से भगवान शिव पर वार किया। कामदेव का यह प्रयास शिव को क्रोधित करने के लिए काफी था। और फिर हुआ वो, जो सृष्टि में पहली बार हुआ- शिव जी ने खोली अपनी तीसरी आंख, और कामदेव वहीं भस्म हो गए। माना जाता है कि ये दिव्य घटना गोपेश्वर के इसी स्थल पर घटी थी, और उसी स्थान पर बाद में गोपीनाथ मंदिर की स्थापना की गई। मंदिर की वास्तुकला भी कम रहस्यमयी नहीं है। कत्युरी राजवंश की स्थापत्य शैली में बने इस मंदिर की दीवारें, दरवाज़े और छतें पत्थर और लकड़ी की बेमिसाल नक्काशी से सजी हैं। गर्भगृह की लकड़ी की छत इस क्षेत्र की पारंपरिक वास्तुकला की झलक देती है। मंदिर का प्रत्येक कोना, हर दीवार, हर पत्थर मानो कोई दबी हुई कहानी कहता है। मंदिर के अंदर स्थापित शिवलिंग भक्तों की गहरी आस्था का केंद्र है। इसके पास जलता हुआ अखंड दीपक सदियों से कभी बुझा ही नहीं हैं । हर बार जब कोई भक्त मंदिर में प्रवेश करता है, तो एक शांति, एक दिव्यता, और एक ऊर्जा उसके भीतर उतरती जाती है। और अब बात करें भोले बाबा के त्रिशूल की, जो इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य है। तो यह कोई साधारण त्रिशूल नहीं, बल्कि एक 5 मीटर ऊंचा विशाल धातु का त्रिशूल है|जिसे देखकर आंखें ठहर जाती हैं। कहा जाता है कि यह त्रिशूल स्वयं भगवान शिव का है। यह ना तो किसी के प्रयास से हिलता है, और ना ही कोई इसे उठा सकता है। लेकिन जिसने भी इसे सच्चे मन और श्रद्धा से छुआ है, उसने इसमें एक कंपन, एक रहस्य, एक हलचल जरूर महसूस की है। स्थानीय जनश्रुतियों में बताया जाता है कि जब कोई व्यक्ति जीवन में सच्ची श्रद्धा और ईमानदारी से भगवान शिव की आराधना करता है, तब ही ये त्रिशूल उसे अपनी ऊर्जा का आभास कराता है। श्रद्धालु इस त्रिशूल के दर्शन मात्र से खुद को भाग्यशाली मानते हैं। गोपीनाथ मंदिर सिर्फ तीर्थ यात्रा का स्थल नहीं, बल्कि शोधकर्ताओं और इतिहास प्रेमियों के लिए भी एक अद्भुत केंद्र है। मंदिर के चारों ओर फैली शांत पहाड़ियां, हिमालय की सफेद चोटियां और हवा में बहती मंत्रमुग्ध कर देने वाली शांति, किसी भी आगंतुक को आंतरिक शांति से भर देती है। महाशिवरात्रि और सावन के महीने में यहां भक्तों की जबरदस्त भीड़ लगती है। मंदिर के परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, भजन-कीर्तन गूंजते हैं और श्रद्धालु शिवलिंग पर जल चढ़ाकर अपने मन की मुरादें मांगते हैं। जब सूरज धीरे-धीरे पहाड़ियों के पीछे छुपने लगता है, मंदिर की दीवारें सिंदूरी रोशनी से नहाने लगती हैं। गोपीनाथ मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा का आरंभ है। यह वह स्थान है, जहां इतिहास, पौराणिकता और रहस्य का मिलन होता है। जहां हर पत्थर, हर दीवार और हर हवा का झोंका शिव की उपस्थिति का एहसास कराता है। यहां आकर लगता है मानो समय थम सा गया हो, इस मंदिर में जलती दीपक की लौ, और शिवलिंग की शांति – ये सब मिलकर एक ऐसी अनुभूति देते हैं, जो शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।