राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस पांच साल बाद सरकार रिपीट करने का सपना तो देख रही थी, लेकिन नाकामी का सबसे बड़ा असर अब कार्यकर्ताओं पर दिख रहा है। पार्टी के कई कार्यकर्ता अभी तक हार के सदमे से उबर नहीं पाए हैं। दो साल पूरे कर चुकी भाजपा सरकार के सामने कांग्रेस अब भी प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाने में संघर्ष कर रही है।
सड़क पर कमजोर, सदन में मुखर
विधानसभा में कांग्रेस सरकार को घेरने की कोशिश जरूर कर रही है, लेकिन सड़कों पर कार्यकर्ताओं की चुप्पी ने विरोध की धार कमजोर कर दी है। इसी माहौल को देखते हुए अशोक गहलोत ने कार्यकर्ताओं से फिर सीधा संवाद शुरू किया है। इससे पार्टी के विभिन्न गुटों के नेताओं की धड़कनें तेज हैं।
अंदरूनी गुटबाजी ने बढ़ाई चिंता
ऊपरी तौर पर नेता एकजुटता की बात करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि गुटबाजी खत्म नहीं हुई। सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा, जूली जैसे चेहरे तो जनता के सामने हैं, लेकिन पार्टी के भीतर कई “स्वयंभू नेता” अपनी अलग राजनीति चमकाने में जुटे हैं।
गांव और जिलों में सक्रिय कार्यकर्ता अब यह तय नहीं कर पा रहा कि किसके साथ काम करे, किसकी बात सुने। उसी मनोस्थिति को दर्शाते हुए गहलोत ने भी सामोद में कहा —
“पार्टी में नेताओं के बीच दूरियां हैं, गुटबाजी है। यही कारण है कि कार्यकर्ता कन्फ्यूजन में है।”
निराशा का दौर और गहलोत की वापसी
कांग्रेस कार्यकर्ताओं में निराशा का यह दौर नया है। सत्ता से बाहर होने का दर्द नेताओं से ज्यादा जमीनी कार्यकर्ताओं को है, क्योंकि जनता से उनका सीधा संपर्क होता है।
अब गहलोत अपने राजनीतिक अनुभव और कार्यकर्ता वाली छवि के सहारे उन्हें फिर से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने सामोद में सेवादल के शिविर के दौरान साफ कहा कि —
“गुटबाजी छोड़ो, एकजुट होकर आगे बढ़ो।”
आलाकमान कमजोर, गुट मजबूत
राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में एक सच यह भी है कि जब आलाकमान कमजोर होता है तो स्थानीय गुट मजबूत हो जाते हैं। दिल्ली की सियासी पकड़ ढीली पड़ने के साथ ही जयपुर के इंदिरा गांधी भवन में “अपनी डफली, अपना राग” का माहौल बन गया है। गहलोत ने अपने भाषण में इसी स्थिति की ओर इशारा किया था।
राजनीतिक संकेत और भविष्य की तैयारी
अशोक गहलोत अपनी सेहत में सुधार के बाद एक बार फिर राज्यभर में दौरे कर रहे हैं। वे कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोल रहे हैं और भविष्य की भूमिका के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।
भले ही सरकार रिपीट न कर पाए हों, लेकिन गहलोत का यह सक्रिय होना उनके समर्थकों के लिए शुभ संकेत माना जा रहा है।
निष्कर्ष
अशोक गहलोत का यह कदम साफ बताता है कि वह अब भी “कार्यकर्ता से नेता” वाली अपनी पहचान बनाए रखना चाहते हैं। सामोद सम्मेलन में कार्यकर्ताओं से उनका संवाद, न केवल मन की बात थी बल्कि पार्टी के भविष्य का रोडमैप भी।

