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भारत-अफगानिस्तान संबंध: क्यों हैं ये एक-दूसरे के लिए महत्वपूर्ण?

करीब चार साल पहले, 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने घोषणा की कि पूरे अफगानिस्तान पर उनका कब्जा हो गया है। यह ऐलान काबुल पर कब्जे के तुरंत बाद किया गया था। साथ ही अफगानिस्तान की सेना ने बगराम एयर बेस पर भी तालिबान के सामने सरेंडर कर दिया। इसके साथ ही अमेरिका का प्रमुख एयर बेस भी तालिबान के नियंत्रण में आ गया।


भारत की नजर और प्रतिक्रिया

उस समय भारत ने इन घटनाओं पर गहरी नजर रखी। कुछ ही दिनों में भारत ने अपने डिप्लोमेंट वापस बुला लिए। इसके बाद से भारत और अफगानिस्तान के बीच कोई औपचारिक उच्च-स्तरीय दौरा नहीं हुआ।

अब अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी 9 से 16 अक्टूबर के बीच भारत दौरे पर आने वाले हैं। मुत्तकी की यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अगस्त 2021 के बाद यह काबुल से नई दिल्ली की पहली उच्च-स्तरीय यात्रा है।

संयुक्त राष्ट्र ने 30 सितंबर को मुत्तकी को विदेशी दौरे के लिए मंज़ूरी दी थी।


भारत का तालिबान के साथ संतुलित दृष्टिकोण

हालांकि भारत लंबे समय से तालिबान विरोधी रहा है और 1980 के दशक में मुजाहिदीन के खिलाफ भी था, भारत ने तालिबान को मान्यता नहीं दी। फिर भी, भारत ने अफगानिस्तान के साथ संबंध बनाए रखे हैं।

भारत लगातार अफगानिस्तान को आर्थिक और मानवीय सहायता प्रदान करता रहा है। इसमें पुनर्निर्माण, शिक्षा और स्वास्थ्य शामिल हैं।


रणनीतिक और भू-आर्थिक महत्व

अफगानिस्तान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित करता है और चाबहार बंदरगाह के जरिए क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाता है।

भारत आतंकवाद जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को रोकने के लिए अफगानिस्तान से सहयोग चाहता है। अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले की तालिबान ने निंदा की, जो सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।


व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग

अफगानिस्तान पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भारत के साथ व्यापार और आर्थिक संबंध बढ़ाना चाहता है।
सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र में भारत ने पाकिस्तान-समर्थित समूहों के अफगानिस्तान में गतिविधियों पर चेतावनी दी।

इस प्रकार, भारत और अफगानिस्तान दोनों के लिए आपसी सहयोग और रणनीतिक हित बेहद महत्वपूर्ण हैं।