बिहार की राजनीति इस समय सिर्फ चुनावी परिणामों की वजह से नहीं, बल्कि राज्य के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवार—लालू प्रसाद यादव के घर—में बढ़ती तल्ख़ियों के कारण भी सुर्खियों में है। परिवारिक रिश्तों में जो मतभेद वर्षों से दबे हुए थे, अब मनभेद बनकर सार्वजनिक मंचों तक पहुँच चुके हैं।
RJD परिवार में बढ़ती दूरियां
तेज प्रताप यादव की नाराज़गी और रोहिणी आचार्य के हालिया बयानों ने यह साफ कर दिया है कि लालू परिवार के भीतर खींचतान एक गंभीर राजनीतिक संकट का रूप ले चुकी है। परिवार के सदस्यों द्वारा सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर अपनी असहमति जताना यह संकेत देता है कि RJD के अंदरूनी समीकरण बिखर रहे हैं।
परिवारवाद बनाम जनता का फैसला
इस बार विधानसभा चुनाव परिणामों ने यह साबित किया है कि बिहार की जनता अब परिवारवाद के ढांचे को आंख बंद करके स्वीकार नहीं कर रही। जातिगत गणित और पारिवारिक विरासत की राजनीति को किनारे करते हुए मतदाताओं ने स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतंत्र अब वंश-आधारित सत्ता को चुनौती दे रहा है।
RJD के लिए सबसे बड़ा अलार्म
तेज प्रताप की खुली नाराज़गी और फिर रोहिणी आचार्य की तीखी प्रतिक्रिया, RJD के सामने ऐसे सवाल खड़े करती है जो किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए चुनौती बन सकते हैं। परिवार के भीतर से उठी यह कलह पार्टी की विश्वसनीयता, नेतृत्व और भविष्य की रणनीति को सीधे प्रभावित कर रही है।
बिहार की राजनीति पर बड़ा असर
लालू परिवार दशकों से बिहार की राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता रहा है। लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि परिवार के भीतर की यह जंग अब सिर्फ निजी विवाद नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकती है।
RJD का कोर वोटबैंक, पार्टी की आंतरिक संरचना और संगठनात्मक मजबूती—तीनों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।

