झारखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
चार महीने के मासूम की मौत के बाद उसका पिता मजबूरी में बच्चे का शव एक प्लास्टिक थैले में लेकर घर लौटने को मजबूर हुआ। सरकारी अस्पताल परिवार को शव ले जाने के लिए कोई वाहन तक उपलब्ध नहीं करा सका।
यह दिल दहला देने वाली घटना पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा की है।
18 दिसंबर को बाला बारीजोड़ी गांव निवासी आदिवासी समुदाय के डिंबा चातोंबा अपने बीमार बच्चे को सदर अस्पताल लेकर पहुंचे थे। बच्चे को कई दिनों से तेज बुखार था और उसने खाना-पीना छोड़ दिया था। इलाज के दौरान 19 दिसंबर को बच्चे की मौत हो गई।
परिवार का आरोप है कि मौत के बाद उन्होंने अस्पताल प्रशासन से शव ले जाने के लिए वाहन की मांग की, लेकिन घंटों इंतजार के बावजूद कोई इंतजाम नहीं किया गया।
परिजनों का कहना है कि न तो अस्पताल ने वैकल्पिक व्यवस्था की और न ही कोई संवेदनशीलता दिखाई।
मजबूरी इतनी थी कि पिता की जेब में सिर्फ 100 रुपये थे।
उसने 20 रुपये में पास की दुकान से एक प्लास्टिक बैग खरीदा, अपने चार महीने के बेटे का शव उसमें रखा और बाकी पैसों से बस का किराया दिया।
डिंबा ने शव को बैग में लेकर चाईबासा से नोआमुंडी तक बस से सफर किया, और फिर वहां से अपने गांव बड़ा बलजोरी तक पैदल गया।
एक मरीज के अटेंडेंट ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि परिवार पूरी तरह बेबस था और अस्पताल से उन्हें कोई मदद नहीं मिली।
अस्पताल प्रशासन की सफाई
हालांकि अस्पताल प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया है।
चाईबासा सिविल सर्जन डॉ. भारती मिंज ने कहा कि एंबुलेंस मृत शरीर ले जाने के लिए नहीं दी जाती, इसके लिए अलग शव वाहन सेवा होती है। जिले में केवल एक ही शव वाहन उपलब्ध है, जो उस समय मनोहरपुर में था।
उनका कहना है कि परिवार से दो घंटे इंतजार करने को कहा गया था, लेकिन वे इंतजार किए बिना ही शव लेकर निकल गए।
राजनीति और सरकार की प्रतिक्रिया
मामला सामने आने के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू किया।
इसके बाद स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने ऐलान किया कि राज्य के हर जिला अस्पताल के लिए चार मॉर्चुरी वाहन खरीदे जाएंगे, जिस पर करीब 15 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
मंत्री ने यह भी दावा किया कि जांच में सामने आया है कि परिवार एंबुलेंस का इंतजार किए बिना ही चला गया था। उनके मुताबिक उस समय दो शव वाहन थे — एक खराब था और दूसरा रास्ते में था।

