शिवभक्तों, क्या आपने कभी उस स्थान के बारे में सुना है… जहां स्वयं भगवान शिव के हृदय और भुजाओं की पूजा होती है? जी हां, आज हम आपको लेकर चलेंगे उस पवित्र स्थल पर… जो न सिर्फ महादेव के पंच केदारों में से एक है, बल्कि विश्व के सबसे ऊंचे शिव मंदिरों में भी गिना जाता है। यह कोई साधारण मंदिर नहीं… यह है तुंगनाथ मंदिर – उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में, समुद्रतल से 3,680 मीटर की ऊंचाई पर विराजमान।अब बात करे पौराणिक मान्यता की तो कहते हैं… कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद जब पांडव नरसंहार के पाप से मुक्त होना चाहते थे, तो उन्होंने भगवान शिव की आराधना का संकल्प लिया।भोलेनाथ उनसे रुष्ट थे, और छुपते-छुपाते वे हिमालय की इन ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं में जा पहुँचे।यहीं, तुंगनाथ पर्वत पर… भगवान शिव प्रकट हुए। और यहीं, पांडवों ने महादेव के हृदय और भुजाओं की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया। इस मंदिर से जुड़ी और भी कहानिया है जैसे मान्यता है कि माता पार्वती ने भी भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए यहीं कठोर तप किया था। और यही नहीं… रावण ने भी शिव को प्रसन्न करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी। जब भगवान राम ने रावण का वध किया, तो ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने भी यहीं शिव की उपासना की।इसलिए इस स्थान को ‘चंद्रशिला’ के नाम से भी जाना जाता है।तुंगनाथ मंदिर की सेवा परंपरा की बात करे तो इस मंदिर की पूजा का दायित्व मक्कामठ गांव के स्थानीय ब्राह्मणों को सौंपा गया है।कहते हैं, ये सेवा उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में मिली है। मैथानी ब्राह्मणों के पूर्वज भी इसी मंदिर में भोलेनाथ के हृदय और भुजाओं की आराधना करते थे।तुंगनाथ मंदिर न सिर्फ एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह श्रद्धा, तपस्या और भक्ति की वह ऊँचाई है, जहां जाकर लगता है — “शिव ही सत्य हैं, शिव ही अनंत हैं।”

