जयपुर: राजस्थान में पंचायतीराज और नगरीय निकाय चुनावों को लेकर चल रहा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। राज्य निर्वाचन आयुक्त Rajeshwar Singh ने पूर्व चुनाव आयुक्त Madhukar Gupta की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि निकायों का कार्यकाल नवंबर 2024 से समाप्त होना शुरू हो गया था, इसके बावजूद समय पर चुनाव नहीं कराए गए।
पुराने परिसीमन पर चुनाव की तैयारी क्यों?
राजेश्वर सिंह के अनुसार, उस समय राज्य सरकार जहां नए परिसीमन की प्रक्रिया में जुटी थी, वहीं तत्कालीन आयुक्त मधुकर गुप्ता पुराने परिसीमन के आधार पर मतदाता सूची संशोधन कार्यक्रम चला रहे थे। इसे उन्होंने “अतार्किक” बताते हुए रोकने की बात कही।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बदली हुई परिस्थितियों में पुराने वार्ड और सीमाओं के आधार पर चुनाव कराना न सिर्फ तकनीकी रूप से गलत होता, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ होता।
बदली जमीनी हकीकत, बढ़े जिले और निकाय
राजस्थान में प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव हुए हैं। वर्ष 2020 के मुकाबले अब राज्य में जिलों की संख्या 33 से बढ़कर 41 हो चुकी है।
इसके साथ ही:
- ग्राम पंचायतों की संख्या 11,320 से बढ़कर 14,403 हो गई
- नगरपालिकाओं की संख्या 152 से बढ़कर 254 हो गई
ऐसे में नई सीमाओं और संरचना के अनुसार परिसीमन करना जरूरी हो गया था।
चुनाव कराना सरकार और आयोग की संयुक्त जिम्मेदारी
राजेश्वर सिंह ने कहा कि निकाय चुनाव कराना केवल चुनाव आयोग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह राज्य सरकार और आयोग दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है।
- राज्य सरकार: नए निकायों का गठन, परिसीमन और आरक्षण तय करना
- निर्वाचन आयोग: मतदाता सूची तैयार करना, चुनाव घोषित करना और प्रक्रिया संचालित करना
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
आयुक्त ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित मामले Suresh Mahajan vs State of Madhya Pradesh का जिक्र करते हुए कहा कि बिना नए परिसीमन और आरक्षण के चुनाव कराना संभव नहीं था।
आगे क्या?
फिलहाल राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग मिलकर नए निकायों के गठन, वार्ड परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। इसके बाद ही प्रदेश में निकाय चुनाव कराए जाएंगे, ताकि पूरी प्रक्रिया संवैधानिक और निष्पक्ष हो सके।

